बीजिंग/वाशिंगटन, 20 मार्च 2026: अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच चीन ने दक्षिण चीन सागर में अपनी सैन्य और आर्थिक गतिविधियाँ तेज कर दी हैं। बीजिंग ने विवादित द्वीपों पर नई सैन्य चौकियाँ स्थापित कीं और अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाने की घोषणा की है। विशेषज्ञ इसे वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव बता रहे हैं।
दक्षिण चीन सागर, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, पर चीन का नियंत्रण बढ़ रहा है। चीनी नौसेना ने स्प्रैटली द्वीपसमूह में अतिरिक्त युद्धपोत तैनात किए हैं। पनडुब्बी गतिविधियाँ दोगुनी हो गईं, जबकि कृत्रिम द्वीपों पर मिसाइल साइटें सक्रिय की गईं। फिलीपींस, वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों ने आपत्ति जताई है, लेकिन चीन ने इसे "आंतरिक मामला" बताया। अमेरिकी प्रशासन ने चेतावनी दी है कि यह तैनाती ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रही है।
चीन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों, विमानों और प्रौद्योगिकी सामानों पर 25-50 प्रतिशत टैरिफ लगाए हैं। इसका कारण अमेरिका का ईरान पर हमलों को समर्थन और दक्षिण चीन सागर में नौसेना अभ्यास बताया जा रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "अमेरिका की आक्रामकता का जवाब देंगे।" इससे अमेरिकी किसानों को करोड़ों डॉलर का नुकसान हो सकता है। सोयाबीन और Boeing विमानों के निर्यात पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा।
यह कदम अमेरिका-ईरान संघर्ष के समय आया है, जब तेल कीमतें पहले ही आसमान पर हैं। दक्षिण चीन सागर से 5 ट्रिलियन डॉलर का वार्षिक व्यापार गुजरता है। चीन का विस्तार यदि बढ़ा तो वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। ASEAN देश चिंतित हैं, जबकि भारत ने नौसेना तैनाती बढ़ाई है। जापान और ऑस्ट्रेलिया ने QUAD बैठक बुलाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ईरान युद्ध का फायदा उठाकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण 39 ट्रिलियन पार होने के बीच यह टैरिफ ट्रंप के लिए नई चुनौती है। वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं।
