कविता के माध्यम से कवि सुंदर स्तुति माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) की वंदना करता है।



"नमामी मां "शैलपुत्री"

 विश्व वृषभ वाहिनी।

 शिव योगी सीमंतिनी

 देवी "ब्रह्मचारिणी"।।

चंद्रज्योति "चंद्रघंटा"

"कुष्मांडा" रूपिणी।

नमामी "स्कंध माता"

नमः नमः कात्यायनी।।

जय देवी "कालरात्रि"

 "महागौरी" रूपिणी।

जय जय "सिद्धि दात्री" 

 जय मां जगत जननी।।

जय नव रात्रि नव दुर्गे 

देवी दुर्गति विनाशिनी।

मां बसंती चैताली मां

नमामी विश्व पालिनी।।"


करुणामय मंडल 

पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम झारखंड 

   

कविता का भावार्थ: 

यह सुंदर स्तुति माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) की वंदना करती है। कवि माँ को अलग-अलग रूपों में याद करते हुए उनके गुणों, शक्तियों और कृपा का वर्णन करता है।


शैलपुत्री: माँ का पहला रूप, जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं। यह शक्ति और स्थिरता का प्रतीक है।


ब्रह्मचारिणी: तपस्या और त्याग का स्वरूप, जो साधना और संयम की शक्ति देती हैं।


चंद्रघंटा: जिनके मस्तक पर चंद्रमा घंटा के आकार का है, यह साहस और शत्रु विनाश का प्रतीक है।


कुष्मांडा: सृष्टि की रचयिता, जिनसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानी जाती है।


स्कंधमाता: भगवान कार्तिकेय की माता, जो ममता और संरक्षण का प्रतीक हैं।


कात्यायनी: दुष्टों का संहार करने वाली शक्ति।


कालरात्रि: भयानक रूप, जो अज्ञान और भय का नाश करती हैं।


महागौरी: शांति, सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक।


सिद्धिदात्री: सभी सिद्धियों और सफलताओं को देने वाली देवी।



अंत में कवि माँ दुर्गा को जगत जननी, दुर्गति विनाशिनी और पूरे विश्व की पालनहार के रूप में प्रणाम करता है। वह माँ से प्रार्थना करता है कि वे संसार के दुखों को दूर करें और सभी की रक्षा करें।


कवि की कल्पना (Imagery & Imagination)


कवि ने अपनी कल्पना में माँ दुर्गा को केवल एक देवी नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड की शक्ति के रूप में देखा है।


कवि ने माँ के हर रूप को अलग-अलग शक्ति और गुण के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है।


उनकी कल्पना में माँ कभी ममता की मूर्ति (स्कंधमाता) हैं, तो कभी भयंकर रूप (कालरात्रि) धारण कर बुराई का नाश करती हैं।


कवि माँ को सृष्टि की रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता—तीनों रूपों में देखता है।


"विश्व पालिनी" और "जगत जननी" जैसे शब्दों के माध्यम से कवि यह दर्शाता है कि माँ दुर्गा पूरे संसार की आधार शक्ति हैं।


"बसंती चैताली" कहकर कवि ने माँ को ऋतु परिवर्तन और नवजीवन देने वाली शक्ति के रूप में भी कल्पित किया है।


 समापन भाव

यह कविता केवल स्तुति नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और शक्ति का संगम है। इसमें कवि माँ दुर्गा के सभी रूपों को स्मरण कर उनसे सुरक्षा, शक्ति और कल्याण की कामना करता है।

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